Homeसाहित्यतुम ही थे: रूची शाही

तुम ही थे: रूची शाही

रूची शाही

औकात से बड़ी चीज चाहने पे
हमेशा संभालते रहने की जिद्द बनी रहती है
कहीं कुछ टूट न जाए
कहीं हाथों से छूट न जाए
कहीं खरोच न लग जाए
कहीं धूल न जम जाए
इतनी परवाह, इतना डर
हमेशा होशो-हवास पे हावी

उन दिनों तुम यही थे मेरे लिए
बहुत मुश्किल था
सामर्थ्य भी नहीं था मेरा
कि तुम्हारी तरफ देख सकूं
और ख्वाहिश भी गलत थी
कितने कांटे और डालती अपने दामन में
हर बार मैंने बस खुद को ही तो चुना था
दुख देने के लिए
तो इस बार मुक्त किया बस खुद को
और जितना बची थी
उसी से संभाल लिया खुद को

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