Friday, April 24, 2026
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कब्रिस्तान की जमीन का विवाद, हाईकोर्ट ने कहा……..

जबलपुर। एमपी के कटनी जिले में वर्षों पुराने कब्रिस्तान को लेकर उठे विवाद पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप किया है। जिला प्रशासन द्वारा भूमि को राजस्व भूमि बताते हुए अधिग्रहण और बेदखली की कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकारए कटनी कलेक्टर सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कटनी के स्लीमानाबाद निवासी निसार बैग और अन्य की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

याचिका में कहा गया कि खसरा नंबर 54 के एक हिस्से की भूमि, जो लगभग 3 एकड़ 14 डिसमिल क्षेत्रफल की है। जिसे जिला प्रशासन राजस्व भूमि बताकर खाली कराने की कोशिश कर रहा है। जबकि यह जमीन सैकड़ों वर्षों से मुस्लिम समुदाय के कब्रिस्तान के रूप में उपयोग में है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इस भूमि पर वर्षों से अंतिम संस्कार दफन किया जा रहा है और यहां करीब एक हजार से अधिक कब्रें मौजूद हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट एनएस रूपराह व एडवोकेट राहुल चौधरी ने कोर्ट को बताया कि मुस्लिम समुदाय करीब 200 वर्षों से इस भूमि का उपयोग कब्रिस्तान के रूप में करता आ रहा है। इसके बावजूद जिला प्रशासन ने अचानक बेदखली का आदेश पारित कर दिया, जो अनुचित और गैरकानूनी है। वकीलों ने यह भी दलील दी कि सीमांकन और परिसीमन से स्पष्ट होता है कि वहां बड़ी संख्या में पहले से कब्रें मौजूद हैं। जो इस बात का प्रमाण है कि भूमि का लंबे समय से धार्मिक और सामाजिक उपयोग होता रहा है।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने इस बात को माना कि एक साथ अचानक इतनी बड़ी संख्या में कब्रों का अस्तित्व संभव नहीं है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि कोई समुदाय वर्षों से किसी भूमि को अपना मानकर उसका उपयोग कर रहा है, तो वह कब्जे के अधिकार की श्रेणी में आ सकता है। हालांकि कोर्ट ने इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की, लेकिन सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

अब इस मामले में राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से जवाब पेश किया जाएगा। इसके बाद हाईकोर्ट यह तय करेगा कि विवादित भूमि पर कब्रिस्तान होने का दावा वैधानिक रूप से किस हद तक मान्य है और प्रशासन की कार्रवाई उचित थी या नहीं।

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