एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता: पंडित दीनदयाल उपाध्याय

162

104 साल पहले आज ही के दिन अर्थात् 25 सितम्बर 1916 को उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गांव में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म हुआ था। पिता भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा माता श्रीमती रामप्यारी देवी की संतान के रूप में जन्मे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने बचपन में ही आत्मीयजनों की लगातार मृत्यु को देखते हुए मानो कच्ची उम्र में ही काल की गति से साक्षात्कार कर लिया था और इस प्रकार जीवन के थपेड़ों की आँच से तप कर एक प्रखर व्यक्तित्व के रूप में समाज-जीवन को निखारने के लिए उभर कर सामने आए थे।

पिता रेलवे में सहायक स्टेशन मास्टर थे। माँ एक धर्मपरायण महिला थीं। 3 साल से भी कम आयु में पिता का साया सिर से हट गया तो इनका लालन-पालन आगरा जिले में फतेहपुर सीकरी के पास ‘गुड़ की मँड़ई’ गांव स्थित ननिहाल में होने लगा। नानाजी भी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे। बालक दीनदयाल अभी 8 साल से कम के ही थे, तो माँ चल बसीं। जब 10 साल के हुए तो नानाजी का देहावसान हो गया। 15वें साल में थे, तो पालन-पोषण करने वाली मामी चल बसीं। 18 साल के हुए तो छोटे भाई का निधन हो गया। इस प्रकार इतनी कम आयु में ही इतने स्वजनों की मृत्यु के आघात को झेल चुके थे।

ये मानो विपदाओं की आँच में तपाकर खरा सोना बनाना चाहती थी प्रकृति इन्हें, और सचमुच ही इन विपरीत परिस्थितियों में विचलित हुए बगैर इनका प्रखर व्यक्तित्व विकसित हुआ और देश को एक महान चिंतक, विचारक और उत्कृष्ट कोटि का राजनीतिज्ञ प्राप्त हुआ।

एक मेधावी विद्यार्थी के रूप में बालक दीनदयाल ने कल्याण हाईस्कूल, सीकर, राजस्थान से 10वीं की परीक्षा बोर्ड में प्रथम स्थान लाते हुए उत्तीर्ण की। वर्ष 1937 में पिलानी से इंटर की परीक्षा भी बोर्ड में प्रथम स्थान लाते हुए उत्तीर्ण की। 1939 में सनातन धर्म काॅलेज, कानपुर से बीए की डिग्री प्रथम श्रेणी में हासिल की। एम ए पूर्वार्ध उत्तीर्ण करने के उपरान्त बहन की मृत्यु हो जाने के कारण एमए उत्तरार्ध की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। मेधावी बहुत थे, इसलिए मामाजी ने प्रशासनिक परीक्षा देने पर जोर दिया। उनके दबाव से प्रशासनिक परीक्षा दी, उत्तीर्ण भी हो गए, किन्तु अंतरात्मा ने अंग्रेजी सरकार की नौकरी करने की गवाही नहीं दी, अतएव इन्होंने नौकरी ज्वाइन नहीं की।

बीए में पढ़ाई के दौरान अपने एक सहपाठी बापूजी महाशब्दे की प्रेरणा से ये ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ से जुड़ गए थे। संघ संस्थापक डाॅ हेडगेवार से इनका पहली बार मिलना कानपुर में हुआ। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के उपरान्त ‘संघ शिक्षा वर्ग’ का द्वितीय वर्ष पूर्ण किया और ‘संघ’ के जीवनव्रती प्रचारक बन गए। 

गुरुजी की प्रेरणा से डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की । ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के माध्यम से पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति के क्षेत्र में पदार्पण करते हुए ‘भारतीय जनसंघ’ में आए । 1952 में कानपुर में हुए इसके प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रस्तुत किये गए 15 प्रस्तावों में से 7 पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ही प्रस्तुत किए थे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की कार्यकुशलता तथा सांगठनिक क्षमता से प्रभावित होकर डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि “मुझे ऐसे दो दीनदयाल मिल जाएँ तो मैं देश की राजनीति का नक्शा बदल दूँ।” पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस अधिवेशन में राष्ट्रीय महामंत्री चुने गए तथा वर्ष 1967 तक इस पद पर बने रहे।

1967 में हुए कालीकट अधिवेशन में इन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया, किन्तु मात्र 43 दिन ही इस पद पर अभी बीते थे, कि 10-11 फरवरी 1968 की रात मुगलसराय स्टेशन के आस-पास रेल में उनकी हत्या कर दी गई।

11 फरवरी 1968 को प्रातः पौने चार बजे मुगलसराय स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर को खंबा नंबर 1276 के पास रेल लाइन के किनारे कंकड़ पर किसी की लाश पड़ी होने की सूचना मिलती है। शव प्लेटफॉर्म पर लाकर रखे जाने पर एकत्रित भीड़ में से किसी ने चिल्ला कर कहा, “अरे ! यह तो भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय हैं “। इसके बाद खबर जंगल में आग की तरह फैल गई और पूरे देश में शोक की लहर व्याप्त हो गई। इस प्रकार देश के एक दैदीप्यमान नक्षत्र का असमय ही दुखद अंत हो गया ।

सादगी तथा सरलता की प्रतिमूर्ति पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक अप्रतिम चिंतक, विचारक तथा कुशल राजनीतिज्ञ थे। वर्ष 1965 में 22 अप्रैल से 25 अप्रैल के बीच मुम्बई में दिए गए चार व्याख्यानों के माध्यम से उन्होंने ‘एकात्म मानवदर्शन’ का प्रतिपादन किया जो मानव तथा समूची सृष्टि के परस्पर सम्बन्धों का विश्लेषण करता है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘मानव’ को केन्द्र में रखकर सृष्टि के विभिन्न घटकों को एक वलयाकार आकृति के रूप में दर्शाते हुए समझाने का प्रयास किया है जिसके अनुसार केन्द्र में ‘व्यक्ति’, व्यक्ति से जुड़ा एक घेरा ‘परिवार’, परिवार से जुड़ा अगला घेरा ‘समाज’, समाज से जुड़ा अगला घेरा ‘राष्ट्र’, राष्ट्र से जुड़ा अगला घेरा ‘विश्व’ और फिर इससे जुड़ा ‘ब्रह्माण्ड’। इनमें से प्रत्येक घटक एक-दूसरे से जुड़ कर अपना अस्तित्व बनाए रखते हुए परस्पर एक-दूसरे के पूरक तथा सहयोगी हैं । इनमें आपस में कोई संघर्ष नहीं है। इस अखण्ड मंडलाकार आकृति में एक घटक से दूसरे, दूसरे से तीसरे फिर तीसरे से चौथे… का विकास होता चला जाता है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार पश्चिम के लोगों ने व्यक्ति का ‘व्यक्ति’ के नाते, समाज का ‘समाज’ के नाते, परिवार का ‘परिवार’ के नाते विचार किया, किन्तु इन सबके बीच एक मूल सम्बन्ध का विचार करना वे भूल गए जो है ‘मानवता’।

डारविन के ‘Survival of the fittest’ के सिद्धांत को वे ‘जंगल का सिद्धांत’ मानते हुए मानव समाज में उसके अस्तित्व को नकारते थे क्योंकि इसमें ‘मानवता’ के तत्व का अभाव था । ‘व्यक्ति बड़ा या समाज ?’ इस प्रश्न को वे गलत समझते थे क्योंकि व्यक्ति और समाज अविभक्त है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार ‘पूंजीवादी’ एवं ‘समाजवादी’ विचारधाराएं केवल मानव के ‘शरीर’ और ‘मन’ की आवश्यकताओं का विचार करती हैं इसलिए वे भौतिकवादी उद्देश्य पर आधारित हैं, जबकि मानव के सम्पूर्ण विकास के लिए इनके साथ-साथ ‘बुद्धि’ और ‘आत्मा’ का विचार किया जाना भी आवश्यक है अर्थात् आत्मिक विकास भी आवश्यक है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समाज के सबसे निचले स्तर के लोगों के विकास को ध्यान में रखते हुए ‘अंत्योदय’ की परिकल्पना प्रस्तुत की। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार पाश्चात्य विचार एक परिस्थितिविशेष तथा प्रवृत्तिविशेष की उपज हैं, ये सार्वलौकिक नहीं हैं। प्रत्येक देश की अपनी विशेष ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति होती है और उसके हिसाब से उस देश के नेता और विचारक देश को आगे बढ़ाने की दृष्टि से मार्ग निर्धारित करते हैं।

एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय से अभी देश को बहुत कुछ मिल सकता था अगर काल की क्रूर गति के वे असमय शिकार नहीं हुए होते। ऐसे दैदीप्यमान सितारे समय-समय पर समाज में आते तो हैं लेकिन एक लम्बे अंतराल के बाद, और अपने जाने के बाद जो रिक्तता छोड़ जाते हैं उसकी भरपाई सम्भव नहीं होती।

ऐसे महामानव को उनके जन्मदिन पर शत शत नमन है !

संजय कुमार राव
snjr32@gmail.com