11 सितम्बर: स्वामी विवेकानंद के विश्वप्रसिद्ध शिकागो व्याख्यान की स्मृति

237

विश्व भर से आए विभिन्न धर्मावलंबी धर्मगुरुओं तथा विद्वानों की सभा में भारत से आया एक युवा सन्यासी अपने उद्बोधन से सबको एक अप्रत्याशित मोहपाश में बाँध लेगा, ऐसा किसने सोचा था! 11 सितम्बर 1893 का वह दिन, अमेरिका के शिकागो शहर का आर्ट पैलेस, वहाँ बैठी अमेरिका के आभिजात्य वर्ग की हजारों की भीड़ तथा विश्व भर से आए विभिन्न मतावलंबी विद्वान प्रतिनिधियों की सभा एक सामान्य-सी गेरुआ वेशभूषा किन्तु चेहरे पर दीप्त आभा लिए हुए युवा सन्यासी स्वामी विवेकानंद द्वारा व्याख्यान शुरू करने के क्रम में किए गए सम्बोधन “अमेरिकावासी बहनों एवं भाइयों!” से ही एक अनिर्वचनीय सम्मोहन में बँध कर तालियों की गड़गड़ाहट से वाह-वाह कर उठी। लोग उत्साह में उठ कर खड़े हो गए। सामान्यतया “देवियों एवं सज्जनों” सुनने के आदी लोगों को “बहनों एवं भाइयों” के सम्बोधन ने अंदर तक झकझोर दिया था।

स्वामी जी द्वारा किया गया इस प्रकार का सम्बोधन अनायास ही नहीं था। इसके पीछे उनकी जितेन्द्रिय मनःस्थिति थी जो मानव के यौन सम्बन्धों की सोच से काफी ऊपर उठ चुकी थी। स्वयं स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, जिसे उन्होंने उक्त सम्बोधन की अप्रतिम स्वीकार्यता को लेकर कभी कहा था, “मुझमें कोई अलौकिक शक्ति नहीं थी। लेकिन एक शक्ति जरूर थी, वह थी- मैंने जीवन में कभी किसी यौन सम्बन्धी विचार या ख़याल को प्रश्रय नहीं दिया। मैंने अपने विचार को, अपने मन को और अपनी शक्ति को सिखाया था, ताकि लोगबाग आमतौर पर जिस स्तर पर सोचते हैं, उसके मुकाबले मैं उच्चतर स्तर पर प्रवाहित हो सकूँ। इसके फलस्वरूप मुझमें एक ऐसी दृढ़ गति तैयार हुई, जिसे कोई भी रोक नहीं सका।”

उपस्थित प्रतिनिधियों तथा जनसमूह द्वारा किये गए स्वागत से अभिभूत स्वामी विवेकानंद कृतज्ञता ज्ञापित करना नहीं भूले और अपने व्याख्यान की शुरुआत ही उन्होंने इस वाक्य से की, “आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से आज मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है।” भारत की सनातन संस्कृति के अनुरूप ‘अहं’ की भावना से परे रह कर ‘समष्टि’ को केन्द्र में रखते हुए उन्होंने स्वयं को भारत के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करते हुए आगे कहा, “मैं आपको विश्व की सबसे प्राचीन संत परम्परा की तरफ से धन्यवाद देता हूँ। मैं आपको सभी धर्मों के उद्भवस्वरूप जो सनातन हिन्दू धर्म है, उसकी तरफ से धन्यवाद देता हूँ और विभिन्न जाति, सम्प्रदाय के कोटि-कोटि हिन्दू नर-नारियों की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूँ।”

अपने से पहले बोल चुके उन वक्ताओं के प्रति वे आभार व्यक्त करना नहीं भूले जिन्होंने अपने सम्बोधन में कहा था कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। सनातन हिन्दू धर्म की सहिष्णुता तथा सर्वमतग्राह्यता को इसकी विशिष्टता के रूप में इंगित करते हुए स्वामी जी ने आगे कहा, “मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम दूसरे धर्मावलम्बियों के प्रति सिर्फ सहिष्णु ही नहीं हैं बल्कि यह स्वीकार भी करते हैं कि कि सभी धर्म सत्य हैं।” सनातन हिन्दू संस्कृति की हृदय की विशालता, अन्य धर्म के लोगों को भी सम भाव से देखने व स्वीकारने की प्रवृत्ति तथा सहिष्णुता की भावना की इतने सरल तथा सपाट शब्दों में व्याख्या करते हुए स्वामी जी ने भारतभूमि तथा इसकी मूल आत्मा हिन्दू धर्म को वैश्विक पटल पर मान दिलाने की सफल कोशिश की।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु के सान्निध्य में रहकर हिन्दू धर्म तथा दर्शन का गहन अध्ययन करने के साथ-साथ वैश्विक परिप्रेक्ष्य में उक्त की सामाजिक भागीदारी के इतिहास का भी सम्यक् ज्ञान प्राप्त किया था उन्होंने। ऐतिहासिक तथ्यों के वृहद् ज्ञान तथा तत्वनिरूपण की अद्भुत शैली के आधार पर बड़ी ही सरलता तथा सहजता से आगे

उन्होंने कहा, “मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ जिसने इस धरती के समस्त देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बात कहते हुए गर्व का अनुभव हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन यहूदियों की पवित्र स्मृतियाँ सँजो कर रखी हैं, जिनके धर्मस्थलों को रोमन आतताइयों ने तोड़-तोड़ कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में आकर शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने जरथ्रुस्त के अनुयायियों और बृहत् पारसी जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह आजतक कर रहा है।” इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने बड़ी ही बेबाकी से हिन्दू धर्म के उदारता भरे स्वरूप का चित्रण किया।

सर्वशक्तिमान ईश्वर एक ही हैं, उन तक पहुँचने के मार्ग (धर्म) भले ही अलग-अलग हों। विश्व के लोग अपने क्षेत्र, परम्परा तथा मान्यताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न धर्म, सम्प्रदाय तथा पंथ के अनुयायी हो सकते हैं किन्तु अंतिम लक्ष्य सबका एक ही है, ऐसी हमारी मान्यता है। इस बात को स्वामी विवेकानंद ने इस प्रकार व्यक्त किया-
“भाइयों, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहूँगा जिसे मैंने बचपन से ही स्मरण किया और दोहराया है तथा करोड़ों लोग जिसका पाठ प्रतिदिन करते हैं-
रुचीनां वैचित्र्याट्टजुकुटिलनानापथजुषाम्।
नृनामेको गम्यस्तवमसि पयसामर्णव इव।।
अर्थात् जैसे विभिन्न नदियाँ विभिन्न स्रोतों से निकल कर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार सीधे-सहज और टेढ़े-मेढ़े विभिन्न राहों से जाने वाले लोग अंत में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।”

स्वामी विवेकानंद आगे कहते हैं, “वर्तमान सम्मेलन जो कि आजतक की सबसे पवित्र सभाओं में से एक है, गीता में बताए गए इस सिद्धान्त का प्रमाण है: जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुँचता हूँ। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुँचते हैं।”

विभिन्न देशों के बीच, विभिन्न धर्मों के बीच, विभिन्न सम्प्रदायों के बीच तथा समाज के विभिन्न वर्गों के बीच फैली परस्पर कटुता तथा वैमनस्य की गहन पीड़ा थी स्वामी विवेकानंद के मन में। अपने इसी भाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “साम्प्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसकी भयानक उपज हठधर्मिता लम्बे समय से धरती को अपने शिकंजों में जकड़ी हुई हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।”

“अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो गया है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश चाहे वे तलवार से हों या कलम से, और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।”

आज से 127 साल पहले स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो में दिया गया उक्त व्याख्यान आज भी प्रासंगिक है। सामाजिक सहिष्णुता, सद्भावना तथा सबको साथ लेकर चलने की संस्कृति रही है हमारी। विद्वेष कभी हमारी हिन्दू संस्कृति व धर्म का अंग नहीं रहा। काश, इसी प्रकार की भावना सबमें होती तो शायद दुनिया आतंकवाद, छल-छद्म तथा वितंडावाद के काले साये में घिरा न होता, जैसा आज दिखता है।

संजय कुमार राव