
ज्योतिष केसरी
संपूर्ण विश्व में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से बनाया जाता है। इस दिन लोग उपवास करते हैं और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण के बाल जीवन से संबंधित रंग बिरंगी झांकियां निकाली जाती हैं।
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की जन्म भूमि मथुरा में विशेष आयोजन होते हैं। महाराष्ट्र में संध्या के समय दही हांडी प्रतियोगिता का आयोजन कर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाने का प्रचलन पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में रोहिणी नक्षत्र में अर्ध रात्रि को मथुरा में देवकी की कोख से अवतार लेकर कंस और उसके दुष्ट असुरों का संहार किया था और भक्तों की रक्षा करके उनका उद्धार किया था। जो व्यक्ति इस व्रत का पालन करता है वह 100 जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025 तिथि और मुहूर्त
श्रीकृष्ण भगवान का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र के दौरान हुआ था। इस बार अष्टमी तिथि का प्रवेश शुक्रवार 15 अगस्त की रात 11:48 बजे से हो रहा है। लेकिन उदयातिथि के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत और उत्सव शनिवार 16 अगस्त को मनाया जायेगा। इस बार चूंकि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का मिलन नहीं हो पा रहा है, तब ऐसे में उदयातिथि की मान्यता रखते हुए शनिवार 16 अगस्त को ही जन्माष्टमी पर्व मनाया जाएगा। शनिवार 16 अगस्त की रात 12:00 बजे जन्मोत्सव होगा।
इस वर्ष की श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की विशेषता यह है कि इस बार गृहस्थ और वैष्णव एक साथ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएंगे और व्रत भी रखेंगे। ज्योतिष विद्या के अनुसार इस साल की जन्माष्टमी पर सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि का अद्भुत योग बन रहा है। अतः भक्त जन यदि पूरे तन मन और श्रद्धा से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करते हैं तो उन्हें अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होगी।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजन विधान
इस दिन प्रात: काल दैनिक नित्य कर्मों आदि से निवृत होकर व्रती को इस प्रकार संकल्प लेना चाहिए कि मैं श्री कृष्ण भगवान की प्रीति के लिए और अपने समस्त पापों के शमन के लिए प्रसन्नता पूर्वक जन्माष्टमी के दिन उपवास रखकर व्रत को पूर्ण करूंगा। अर्धरात्रि में पूजन के पश्चात दूसरे दिन भोजन करूंगा। इस दिन व्रती को ब्रह्मचर्य, शुचितस आदि नियमों का पालन करते हुए निर्जला व्रत रखना चाहिए। इस दिन घरों और मंदिरों में भी भगवान श्री कृष्ण के भजन, कीर्तन और उनके लीलाओं के वर्णन करने चाहिए। संध्या के समय भगवान को भोग लगाऔर झूला झुलाना चाहिए। मध्य रात्रि में भगवान के जन्म के पश्चात श्री कृष्ण की वंदना पूजा और आरती करना चाहिए। उसके बाद दही, माखन, फल, धनिए की पंजीरी और सूखे मेवे मिले हुए हलुआ आदि का प्रसाद भोग लगाकर भक्तों में बांटना चाहिए। दूसरे दिन ब्राह्मणों को प्रेम से भोजन कर कर स्वयं भी व्रत का पारण करना चाहिए।
पौराणिक संदर्भ
यह कथा द्वापर युग की है। मथुरा नगरी में राजा अग्रसेन का राज्य था। उनका पुत्र कंस परम प्रतापी होने के बावजूद अत्यंत निर्दयी स्वभाव का था। उसके अत्याचारों से आमजन बहुत दुखी थे। कंस अपनी बहन देवी की से अत्यधिक स्नेह करता था। जब देवी की का विवाह वसुदेव से संपन्न हुआ तो विदाई के समय एक आकाशवाणी नें कंस को चेताया कि तुम्हारी मृत्यु का कारण तुम्हारी ही बहन देवी की का आठवां पुत्र होगा।
इस पर कंस ने वासुदेव और देवकी को एक कारागार में डाल दिया। जहां उसने दोनों की साथ संतानों की हत्या भी करदी। आठवीं संतान को कंस से बचने के लिए वासुदेव अर्धरात्रि में बालक को गोकुल में नंद जी के यहां छोड़ आए। देवी की और वासुदेव की यही आठवीं संतान भगवान श्री कृष्ण का अवतार थी। कंस को अपने सूत्रों से ज्ञात हो गया था कि कृष्ण का लालन-पालन गोकुल में नंद जी के यहां हो रहा है। तब उनका वध करने के लिए कंस ने बकासुर और पूतना जैसे कई राक्षसों को नंद जी के यहां भेजा। लेकिन उन सब का संहार भगवान श्री कृष्ण ने कर दिया। अपने बचपन में भगवान श्री कृष्ण की अलौलिक लीलाओं ने सबको चकित कर दिया था।
आगे चलकर मात्र 16 वर्ष की आयु में भगवान श्री कृष्ण ने ही निर्दयी कंस का संहार किया और अपने माता-पिता को कारागार से छुड़ाया। अपने नाना अग्रसेन को पुनः मथुरा का राज्य सौंप दिया। भगवान श्री कृष्ण के इस अलौकिक रूप को देखकर सभी लोग उनके सामने नतमस्तक हो गए ऐसे दिव्य परमात्मा भगवान श्री कृष्ण की श्रद्धा और भक्ति में यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन भागवत पुराण और श्रीमद्भागवत गीता का पाठन अत्यंत फलदायी होता है।











