जबलपुर में स्थित माँ लक्ष्मी का प्राचीनतम पचमठा महालक्ष्मी मंदिर बहुत ही सिद्ध मंदिर माना जाता है और भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर में दीवावली पर विशेष अनुष्ठान, श्री साधना एवं कनकधारा स्त्रोत का पाठ किया जाता है।
मंदिर के पुजारी आचार्य कपिल महाराज ने बताया कि पचमठा महालक्ष्मी का मंदिर 1100 वर्ष प्राचीन है। इस मंदिर में विराजित माँ लक्ष्मी की प्रतिमा 24 घंटे में तीन बार अपना रूप बदलती है। ये प्रतिमा सुबह सफेद, दोपहर में पीली और शाम को नीले रंग की हो जाती है। उन्होंने बताया कि इस मंदिर की विशेषता यह है कि सूर्य की पहली किरण मंदिर में विराजित माँ लक्ष्मी के चरणों पर पड़ती है और इसके पश्चात मुख पर।
आचार्य कपिल महाराज ने बताया कि मंदिर में दिवाली के दिन 24 घंटे की विशेष पूजा-अर्चना होती है। जिसमें सुबह 4 बजे महाअभिषेक होता है, इसके पश्चात दिन भी भक्तों को तांता लगा रहता है, इसके बाद रात 1 बजे से पंचमेवा, लौंग-इलायची, पान से सहस्त्रार्चन किया जाता है और फिर हवन किया जाता है, जिसमें 500 नारियलों की आहूति दी जाती है। इसके अलावा इस मंदिर में धनतेरह के दिन से अगले 11 दिन तक सामूहिक रूप से श्रीसाधना की जाती है। वहीं दीपावली पर प्रसाद के साथ सिद्ध श्रीयंत्र भी वितरित किया जाता है। आचार्य कपिल महाराज ने बताया कि जो श्रद्धालु बिना नागा सतत सात शुक्रवार यहां आता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। माँ की कृपा से कंगाल भी धनवान बन जाते हैं। साथ ही यहां मन्नत का नारियल बांधने की परम्परा भी है।
आचार्य कपिल महाराज ने बताया कि ये मंदिर कल्चुरिकालीन है और इसकी पुष्टि पुरातत्वविद भी कर चुके हैं। पांच शिखरों की रचना के आधार पर इस मंदिर को पचमठा मंदिर कहा जाता है। यह वर्गाकार मंदिर अधिष्ठान पर निर्मित है और मंदिर का निर्माण श्रीयंत्र के आधार पर हुआ है। इसके चारों दिशाओं में अर्धमंडप है। इस मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा पथ बना है। वहीं दीवारों पर बने आलों में योगनियां बनी हैं। मंदिर का द्वार बेहद खास रूप में अलंकृत है, जहां सबसे नीचे योगी और उसके दोनों ओर सिंह की आकृतियां हैं। उन्होंने बताया कि इस इसके चार दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं में बने हैं। जहां गजलक्ष्मी की प्रतिमा है।











