
आजकल पितृपक्ष के पावन दिन चल रहे हैं। आइए जानते हैं पितरों के अधिष्ठाता देवता “अर्यमा” के बारे में। सनातन धर्म की परंपरा में देवताओं की एक विशाल श्रंखला है, जिनमें प्रत्येक देवता का अपना विशिष्ट कार्य और महत्व है। इन्हीं देवताओं में से एक हैं अर्यमा (Aryama), जिन्हें विशेष रूप से पितृगणों के देवता माना गया है। वैदिक साहित्य, पुराणों और स्मृति ग्रंथों में अर्यमा का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से मिलता है। वे आदित्यों में से एक हैं और पितरों तथा यज्ञों के अधिपति कहे गए हैं।
अर्यमा का परिचय
‘अर्यमा’ शब्द संस्कृत धातु “ऋ” (गति करना, आगे बढ़ना) से बना है, जिसका अर्थ है– मित्र, सखा, या निकट संबंधी। ऋग्वेद में अर्यमा को एक ऐसे देवता के रूप में वर्णित किया गया है जो सच्चे धर्म, न्याय और मित्रता के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अर्यमा बारह आदित्यों में से एक हैं। आदित्य सूर्यदेव के विभिन्न स्वरूप हैं, जिनमें प्रत्येक किसी विशेष क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। जैसे– वरुण जल के अधिपति हैं, मित्र मैत्री के देवता हैं, उसी प्रकार अर्यमा पितरों के अधिपति देवता माने जाते हैं।
पितरों के देवता क्यों कहे जाते हैं?
पितृयज्ञ और श्राद्ध संस्कार सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि पितरों की तृप्ति के बिना देवताओं की पूजा भी पूर्ण नहीं होती। अर्यमा ही वह देवता हैं जो जीवित संतानों और पितृलोक में स्थित पूर्वजों के बीच सेतु का कार्य करते हैं। श्राद्ध और तर्पण में अर्पित अन्न, जल और पिंड अर्यमा के माध्यम से पितरों तक पहुँचता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार यदि कोई श्राद्धकर्म के समय अर्यमा का ध्यान नहीं करता तो पितृ तृप्त नहीं होते। ऋग्वेद के सूक्त (10/64/4) में अर्यमा को “पितृणाम अधिपतिः” कहा गया है, अर्थात् वे पितरों के अधिपति और मार्गदर्शक हैं।
अर्यमा का स्वरूप और गुण
अर्यमा को सौम्य, न्यायप्रिय और धर्मपालक देवता के रूप में चित्रित किया गया है। उनके प्रमुख गुण इस प्रकार बताए गए हैं, सखा और बंधुता के प्रतीक– अर्यमा को वैदिक समाज में मित्रता और सौहार्द का देवता कहा गया है। न्यायप्रिय– वे अधर्म और अन्याय से रक्षा करते हैं। पितृ संयोगकर्ता– वे जीवितों को उनके पितरों से जोड़ते हैं और श्राद्धकर्म को फलदायी बनाते हैं। यज्ञप्रिय– अर्यमा यज्ञों के देवता भी हैं। ऋग्वेद में उन्हें यज्ञों का सह-अध्यक्ष बताया गया है।
सनातन धर्म में अर्यमा का महत्त्व
सनातन धर्म में अर्यमा का महत्व मुख्यतः तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पितृयज्ञ और श्राद्धकर्म में- हर गृहस्थ को पंचमहायज्ञों का पालन करना आवश्यक है, जिनमें से एक है पितृयज्ञ। पितृयज्ञ के अंतर्गत श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान होते हैं, जिनका अधिकारी अर्यमा ही हैं। श्राद्धकर्म के समय आह्वान किया जाता है- “ॐ अर्यमणे नमः”। इसका अर्थ है कि जो अर्पण हम कर रहे हैं, वह अर्यमा देव के माध्यम से हमारे पूर्वजों तक पहुँचे। सामाजिक और नैतिक स्तर पर- अर्यमा केवल पितरों के देवता ही नहीं, बल्कि सामाजिक मर्यादा और संबंधों के भी रक्षक माने गए हैं। वे विवाह संबंधों में भी साक्षी देवता माने जाते हैं। अथर्ववेद में विवाह के समय अर्यमा का आह्वान किया जाता था ताकि दाम्पत्य जीवन सुखमय और धर्मनिष्ठ हो। इस प्रकार अर्यमा पारिवारिक जीवन और सामाजिक समरसता के भी प्रतीक हैं। आध्यात्मिक स्तर पर- पितृपक्ष के समय जब हम श्राद्ध और तर्पण करते हैं, तब वास्तव में हम अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़ते हैं। अर्यमा इस आध्यात्मिक सेतु का कार्य करते हैं। वे हमें स्मरण कराते हैं कि जीवन केवल भौतिक नहीं है, बल्कि पूर्वजों और परंपरा से जुड़ा हुआ आध्यात्मिक प्रवाह भी है। अर्यमा का स्मरण करने से मनुष्य में कृतज्ञता और परिवारजनों के प्रति दायित्व-बोध की भावना जागृत होती है।
पौराणिक उल्लेख
महाभारत में कहा गया है कि जब श्राद्ध के समय पितरों को अर्पण दिया जाता है तो वह अर्यमा के माध्यम से उन तक पहुँचता है। भागवत पुराण के अनुसार पितृलोक का संचालन अर्यमा ही करते हैं। यमराज धर्म और न्याय के अधिकारी हैं, जबकि पितरों के कार्यों के अध्यक्ष अर्यमा देव हैं। विष्णु पुराण में भी उन्हें पितरों का अधिपति बताया गया है और कहा गया है कि अर्यमा को प्रसन्न किए बिना पितरों की संतुष्टि संभव नहीं है।
आधुनिक सन्दर्भ में अर्यमा का महत्व
आज की भौतिकवादी जीवनशैली में अक्सर लोग अपने पूर्वजों की परंपराओं को भूल जाते हैं। परंतु श्राद्ध, तर्पण और पितृयज्ञ हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारा अस्तित्व हमारे पूर्वजों के कारण ही है। अर्यमा हमें यह सिखाते हैं कि पूर्वजों का सम्मान करना केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। पारिवारिक संबंधों में सामंजस्य और पीढ़ियों के बीच सेतु बनाने का कार्य अर्यमा की स्मृति से मजबूत होता है।
पितरों के देवता अर्यमा सनातन धर्म में अत्यंत पूजनीय स्थान रखते हैं। वे केवल पितृलोक और जीवितों के बीच सेतु ही नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों, मैत्री और धर्म के भी संरक्षक हैं। श्राद्ध और तर्पण में अर्यमा का स्मरण करना आवश्यक है, क्योंकि उनके माध्यम से ही पितरों तक अर्पित वस्तुएँ पहुँचती हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अर्यमा देव की पूजा और स्मरण से न केवल पितृ प्रसन्न होते हैं, बल्कि जीवन में पारिवारिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संतुलन भी स्थापित होता है। यही कारण है कि सनातन धर्म में अर्यमा का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय और सांस्कृतिक दृष्टि से भी वे अति महान है।











