Sunday, July 26, 2026
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असम से 3 साल में 3 समूहों में 50 जंगली भैंस, एक जोड़ा गेंडा और 3 कोबरा आएंगे मध्य प्रदेश

भोपाल,(हि.स.)। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार शाम को गुवाहाटी प्रवास के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ वन्य जीवों के आदान-प्रदान को लेकर चर्चा की।

दोनों राज्यों के बीच में सहमति बनी कि असम से 50 जंगली भैंसे 3 समूहों में तीन साल में, गैंडे का एक जोड़ा और तीन कोबरा मध्य प्रदेश में लाए जाएंगे। इन्हें भोपाल के वन विहार में रखा जायेगा। मध्य प्रदेश इसके बदले में असम की मांग के अनुसार एक जोड़ा टाइगर और छह मगरमच्छ देगा।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्य प्रदेश में चीते के बाद अब भैंस पुनर्स्थापना से प्रदेश की जैव विविधता में एक नया आयाम जुड़ेगा। यह प्रयास एक प्रजाति के संरक्षण के साथ ही प्रदेश के जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश पहले ही ‘टाइगर स्टेट’ और ‘लेपर्ड स्टेट’ के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। सफल चीता पुनर्स्थापना के बाद जंगली भैंसों की पुनर्स्थापना से राज्य के जैव विविधता संरक्षण क्षेत्र में एक नया अध्याय जुड़ेगा।

राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण के साथ ही उन प्रजातियों की वापसी के लिए भी प्रतिबद्ध हैं, जो कभी इस भूमि की पहचान हुआ करती थीं।

मध्य प्रदेश में जंगली भैंसों की आबादी पिछले सौ वर्षों से भी अधिक समय पहले समाप्त हो चुकी थी। वर्तमान समय में देश में जंगली भैंसों की प्राकृतिक आबादी मुख्य रूप से असम राज्य तक सीमित रह गई है। छत्तीसगढ़ में भी ये हैं, किंतु इनकी संख्या अत्यंत सीमित है।

इस अवसर पर बताया गया कि देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया कि कान्हा टाइगर रिज़र्व जंगली भैंसों के पुनःस्थापन के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र है।

अध्ययन में घास के मैदानों की गुणवत्ता, जल स्रोतों की उपलब्धता, मानव हस्तक्षेप की न्यूनता और अन्य शाकाहारी जीवों के दबाव जैसे कारकों का मूल्यांकन किया गया है।

मध्य प्रदेश शासन द्वारा इस संबंध में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) तथा भारत सरकार से आवश्यक अनुमतियाँ प्राप्त करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है।

पुनर्स्थापन को चरणबद्ध और सुरक्षित ढंग से अंजाम दिया जाएगा। यह योजना दीर्घकालिक संरक्षण और प्राकृतिक प्रजनन को ध्यान में रखकर तैयार की गयी है।

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