सोशल इंजीनियरिंग के नए परिप्रेक्ष्य की व्याख्या करती पुस्तक: राजनीति की जाति- स्नेहा किरण

बिहार की जाति आधारित राजनीतिक हलचलों पर सबसे लोकप्रिय मासिक पत्रिका वीरेंद्र यादव न्यूज के 57वें ऐतिहासिक अंक की जिसे पत्रकारिता जगत ने स्वाभिमान अंक की संज्ञा दी है। इस पत्रिका के सभी ख़ास संकलन के आधार पर तैयार की गई पत्रिका राजनीति की जाति को विशेष रूप से स्वाभिमान अंक नाम दिया गया है।
पिछले 30 वर्षों में राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पर गैरसवर्ण लोग ही बैठे रहे, इस अंक में इसी बात का विचारमंथन किया गया है कि 30 वर्षों की गैरसवर्ण सरकार की वास्तविक उपलब्धि आखिर क्या रही? इसको समझने के लिए पत्रिका के इस ऐतिहासिक अंक के सभी लेखकों का आलेख और विचार आपको पढ़ना होगा। बिना इसे पढ़े आप इस तथ्य की गहराई को समझ ही नहीं सकते।
एक आम व्यक्ति के लिए 30 साल सरकार की यात्रा हो सकती है, लेकिन पत्रिका के लिए यह 30 साल सरोकार की यात्रा रही है। वीरेंद्र यादव न्यू्ज गैर सवर्ण की बात करता हो या यादव जमात की बात करता हो। इसने जातिगत मुद्दों को ही अपना मूल आधार बनाया है। इसकी पूरी वजह भी है क्योंकि हम एसटी, एससी, ओबीसी या अल्पसंख्यक को अलग-अलग खांचे में नहीं बांटते हैं। हम सभी को समग्र रूप से गैर सवर्ण के रूप में ही देखते हैं। यादव जमात की बात हम इसलिए करते हैं क्योंकि यह गैरसवर्ण उस तथाकथित सवर्ण सरोकार के पक्ष में मजबूती से लड़ता रहा है। बिहार की पूरी आबादी का लगभग 15 फीसदी यादव जाति ही 15 फीसदी सवर्ण सरोकार को अब तक कड़ी चुनौती देती रही है। इसलिए आज यादव जमात को महज एक जाति नहीं, बल्कि 85 फीसदी के हित में लड़ने वाली एक मजबूत ताकत ही माना जाए तो अच्छा है और पिछले कुछ वर्षों में देखा जाए तो सामाजिक सम्मान और सत्ता की लड़ाई यादवों ने ही लड़ी है और उसके साथ अन्य जातियां मजबूती के साथ खड़ी रही हैं। बिहार में सामाजिक व राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण के आंदोलन में यादवों ने एक मजबूत रीढ़ की हड्डी का ही काम किया है।
वीरेंद्र यादव न्यूज़ मासिक पत्रिका के संपादक और जातिगत विषयों पर लिखी गई देश की अब तक की सबसे मंहगी पुस्तक राजनीति की जाति के लेखक वीरेंद्र यादव ने बताया कि पत्रिका का पहला अंक दिसंबर 2015 में प्रकाशित हुआ था। दिसंबर 2015 में इस पत्रिका के दो अंक पाक्षिक के रूप प्रकाशित किये गये। इसके बाद जनवरी 2016 से यह पत्रिका लगातार मासिक रूप से प्रकाशित हो रही है। इस पत्रिका ने कई प्रासंगिक विषयों पर विशेषांक भी प्रकाशित किया है। इसमें सबसे महत्व्पूर्ण विषय था बिहार चुनाव विशेषांक। जिसका प्रकाशन फरवरी 2020 में किया गया। इसके संबंध में संपादक महोदय ने बताया कि इस अंक में बिहार के सभी विधान- सभा क्षेत्रों में 9 प्रमुख जातियों के वोटरों की संख्या और उनके चुनावी रुझान को प्रकाशित किया गया है। चुनाव में रुचि रखने वालों के लिए यह पुस्तक काफी उपयोगी है। चुनाव ल़ड़ने के इच्छुक व्यक्ति के लिए ये आंकड़े काफी उपयोगी है।
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से स्नातक, अपने पटना प्रवास के दौरान हिंदुस्तान और प्रभात खबर समाचार पत्र में कई महत्वपूर्ण जिम्मेवारियों का निर्वहन कर चुके लेखक , संपादक और पत्रकार वीरेंद्र यादव ने पत्रकारिता में जाति को ही अपने शोध का विषय बनाया है।
राजनीति की जाति पुस्तक में जाति को लेकर बहुत सामग्री है। यह जातिगत राजनीति पर लिखी गई देश की अब तक की सबसे मँहगी पुस्तक है। उन्होंने बताया कि ‘राजनीति की जाति’ देश की जातिगत व्यवस्था पर लिखी गई अब तक की सबसे महंगी पुस्तक है। इसकी कीमत चार अंकों में है 5500 रुपये है। वे कहते हैं कि यह पुस्तक मासिक पत्रिका वीरेंद्र यादव न्यूज के अब तक के सभी अंकों का संकलन है और उसी को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है। पत्रिका के हर अंक में चुनावी और जातिगत आंकड़ों को प्रकाशित किया जाता है। इसका एकमात्र मकसद यही है कि पाठकों को अधिका‍धिक जानकारी दी जा सके। उनका कहना हैं कि बिहार की राजनीति में जाति सबसे बड़ा फैक्टर रहा है, इतना बड़ा की आप इसकी उपेक्षा कर ही नहीं सकते और पत्रिका ने उसी को अपना विषय बनाया है। यही कारण है कि पत्रिका का हर अंक आज तक जाति को लेकर खास सामग्री देता रहा है।
वे कहते हैं कि पत्रिका का प्रकाशन एक अव्यवसायिक प्रयास है। यह पत्रिका मूलतः अपने पाठकों से प्राप्त आर्थिक मदद से ही प्रकाशित होती है और इसका वितरण मुफ्त में किया जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सुधि पाठकों, ईमानदार आलोचकों, सहृदय प्रशंसकों के लिए इस पत्रिका की कोई कीमत नहीं है। वहीं लेखक, पत्रकार और संपादक वीरेंद्र यादव की यह पुस्तक राजनीति की जाति बिक्री के लिए हर जगह उपलब्ध भी है। यह पुस्तक वीरेंद्र यादव से संपर्क करके ही प्राप्त की जा सकती है। वे कहते हैं कि पुस्तक की कीमत ऑनलाइन भुगतान के बाद उसे कुरियर से भी भेजा जा सकता है।
पत्रिका के सभी तकनीकी पक्ष का जिम्मा श्रीमान अमरेंद्र पटेल संभालते हैं। पर उनका मानना है कि यह एक सामूहिक प्रयास ही है। इस प्रयास को पाठकों का पूरा समर्थन और सहयोग मिलता रहा है। यही कारण है कि पत्रिका नियमित रूप से अब तक प्रकाशित हो रही है।
पत्रिका के इस अंक में कई विश्वविद्यालयों के सहायक प्रोफेसर और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लोगों के विचारों को जगह दी गई है। इस स्वाभिमान विशेषांक का मूल मकसद यही है की- बिहार में ग़ैरसवर्ण सत्ता के पिछले 30 वर्षों की उपलब्धियों को अलग-अलग नजिरये से देखा जा सके। यह पत्रिका पहली बार 32 पन्नों में प्रकाशित हुई है। इसका मकसद यह भी था कि अधिक से अधिक लोगों को पत्रिका में जगह मिले। पत्रिका अपने नए कलेवर में अब आप सबके सामने हैं। आप इसमें हमारी कमियों को जितना उजागर करेंगे, वह हमारे पत्रकारिता जगत के अनुभव के लिए उतना ही उपयोगी साबित होगा।

-स्नेहा किरण
लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता,
पीपुल्स पॉवर प्रवक्ता,
बिहार