अंजना वर्मा
ई-102, रोहन इच्छा अपार्टमेंट
भोगनहल्ली, विद्या मंदिर स्कूल के पास
बेंगलुरू-560103
anjanaverma03@gmail.com
दिखती नहीं है घर-आँगन में
छज्जे पर गौरैया
बाग-बगीचे हुए हैं सूने
सूनी लगे मड़ैया
उसके साथ बहुत अपनापन
भरा हुआ रिश्ता था
धूप में पसरे चावल का
दो दाना उसका था
बच्चों की टोकरियों में वह
अक्सर फँस जाती थी
घर-घर में वह नीड़ बनाने
को तिनके लाती थी
ये बातें इतिहास बनी हैं
क्यों, बोलो अब भैया ?
सुबह गुलाबी होते झनझ़न
बजने लगता आँगन
होने लगती नींबू-अमरूदों
पर चुनमुन-चुनमुन
अँधेरी कोठरियाँ भी तो
आलोकित रहती थीं
जब गोरैया रोशनदानों
में कलरव करती थी ं
जीवन का संगीत सुनाया
करती थी गौरैया
काट-काटकर हरियाली जो
हमने नगर बनाए
ईट-पत्थरों के जंगल में
पंछी ना रह पाए
घास-फूस-तिनकों की कोई
जगह नहीं है घर में
नहीं साथ चल पाए पाखी
इस बेसुरे सफर में
भीड़-शोर की माया नगरी
में ना शीतल छैंया
घटती ही जाती है इनकी
दिन-पर-दिन आबादी
क्यों हम छीना करते खग की
जीने की आज़ादी
चला जा रहा जग से मिटता
इनका ठौर-ठिकाना
मानव ने साधा निसर्ग पर
कैसा कड़ा निशाना
बस मानव ही बचेगा जबकि
ऐसा रहा रवैया















