अनुजीत इकबाल
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
ईमेल– anujeet.lko@gmail.com
युगों से अभिशप्त
मेरे स्वछंद हृदय की कामना
विस्थापित हो सूर्य हुई
जिसकी ऊष्मा से
मेरे समस्त दुश्चरित्र स्वप्नों के बीज
अंतहीन विस्तार पा गए
और तुम्हारे मौन प्रेम के जल से
रक्त पुष्प प्रस्फुटित हुए
मेरे बोधिसत्व प्रेम
तुम आना अपने स्फुट उत्कर्ष में
मेरे ऊर्जा केंद्र जागृत करने
मैं चाहती हूं तुम अपने ईश्वर को नकार दो
और मेरे उन्माद को विक्षिप्तता में बदल दो
जैसे प्रकृति अनगढ़ मौन में
निर्माण को विध्वंस में बदल देती है
और फिर आता है
परम स्थैर्य
तुम्हारे हाथ के कंपन
मेरी अबूझ, अदेह भाषा समझते हैं















