अयोध्यानाथ चौधरी
जनकपुरधाम, नेपाल
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तमाम रात ढल चुकी
और चांद घूरता रहा
शायद मुझे वो भूल गए
मैं रास्ता तकता रहा
कहां गए वो छोड़कर
मैं द्वन्द्व से लड़ता रहा
सुनसान चारों ओर देख
मैं आह भर भरता रहा
कोशिश तो की भूलने की
पर मैं तो पछड़ता रहा
ना हां कहा, ना न कहा
बेमौत मैं मरता रहा















