सावन: वंदना सहाय

वंदना सहाय

जला था मन
इस धरा के संग
आया सावन

बरस के भी
बरसे न सावन
पहले जैसा

गिरीं बारिशें
याद आईं ख़्वाहिशें
भूली-बिसरी

गिरतीं बूँदें
सावन चित्तचोर
मीठा-सा शोर

बूँदें हैं गातीं
सावन दे संगीत
धरा नाचती

बरस कर
धुने कपास जैसे
फैले हैं मेघ

धरती हँसी
सावन ने जब दी
हरी ओढ़नी

आया सावन
चुनर हुई धानी
पीली दूब की

नीले नभ के
ताल में विचरता
बादल-हंस

आँख मिचौली
खेलें धूप-बादल
बरसात में

बजा रहीं हैं
गिरतीं ये बारिशें
जलतरंग

शोर न करे
आँखों का ये सावन
धीरे से झरे