वंदना सहाय
सूनी आँखों में
ठहरा हुआ पानी
सुनो कहानी!
न थी अपेक्षा
बच्चों की यूँ उपेक्षा
ढलती उम्र
बुढ़ापा चाहे
तुम्हारी स्नेह-भरी
एक छुअन
छड़ी टेकता
शेष पलों को जीता
ये है बुढ़ापा
देखो! हो गईं
बुढ़ापे में दवाएँ
सहगामिनी
बुढ़ापे में आ
टूटे जो अरमान
हुए सामान
हाय बुढ़ापा!
झुर्रियाँ हैं सुनाती
बिसरी गाथा
बच्चों के लिए
देखतीं हैं सपने
धुँधली आँखें
ये जो बुढ़ापा!
कितना मजबूर
थक के चूर
देते जो प्यार
उनका तिरस्कार
न करें हम
चश्मा औ’ घड़ी
बुढ़ापे में लगे
सगे संबंधी
क्यूँ है बुढ़ापा
उदास और मौन
पूछता कौन?
ढलती उम्र
लगता है आईना
अजनबी-सा















