बेटी का कर्तव्य: अंकिता

प्रिया अपने घर पर बैठी है। शाम हो चुकी थी। बैठे-बैठे वो अपने जीवन के बारे में सोच रही है। वह अपने जीवन से बहुत अधिक निराश थी। उसे आशा की कोई भी किरण, अपने जीवन में नजर नही आ रही थी, क्योंकि उसके माता-पिता की तबीयत ठीक नहीं रहती थी।

प्रिया की माँ , एक मामूली सी नौकरी कर के घर का निर्वाह करती थी। इसलिए वह चिंतित थी , कि उसकी माँ कितनी देर तक नौकरी कर घर का निर्वाह करेगी। वह मन ही मन यह सोचती कि उसे भी अब कुछ न कुछ करना चाहिए। अचानक से उसके पिता जी कमरे से बाहर आते हैं और प्रिया से चाय मांगते हैं। कुछ देर में प्रिया चाय लाकर अपने पिता जी को देती है।

तभी अंदर से प्रिया की माँ की आवाज आती है और प्रिया चली जाती है। थोड़े समय पश्चात फोन की घंटी बजती है और प्रिया फोन उठाती है तो पता चलता है कि उसके पापा अपने दोस्त के घर चले जाते हैं। थोड़ी देर बाद अस्पताल से फोन आता है कि उसके पापा का एक्सीडेंट हो गया है।

सूचना पाकर प्रिया और उसकी माँ अस्पताल पहुंचते हैं, तो डॉक्टर उन्हें बताता है कि एक्सीडेंट की वजह से बहुत खून बह गया है। चोट ज्यादा लगने के कारण उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा, इसके लिए एक लाख रुपये का इन्तजाम कर लें।

प्रिया और उसकी माँ यह सुनकर बहुत चिंतित होते हैं कि वह अब एक लाख रुपये कहाँ से लाएं, क्योंकि कि उनके पास तो कुछ भी नहीं हैं। प्रिया अपनी माँ से से कहती है कि हम अपने रिशतेदारों से कुछ कर्ज ले लेते हैं। वो दोनों अपने रिशतेदारों से उधार माँगने जाते हैं, मगर सभी लोग कर्ज़ देने से इन्कार जारी कर देते हैं। इससे प्रिया और उसकी माँ निराश हो जाती हैं। निराशा में वो दोनों जगह -जगह भटकती हैं, लेकिन उनकी मदद के लिए कोई भी तैयार नहीं होता।

इसके बाद प्रिया की माँ जहाँ नौकरी करती है, वे वहां से मदद मांगते हैं, लेकिन वहां से जितनी मदद मिलती है, उससे कुछ नहीं होता, क्योंकि उन्हें तो एक लाख रुपये की जरूरत होती है, जिसमें अभी भी बहुत रुपये कम पड़ रहे थे। इसके बाद निराश प्रिया और उसकी माँ घर जा रहे होते हैं, तभी रास्ते में प्रिया को उसकी एक पुरानी दोस्त मिलती है, जो आशा की किरण बन कर उसके सम्मुख आती है।

वह प्रिया से पूछती है कि क्या बात है? तुम निराश क्यों हो? तब प्रिया रोते-रोते उसे दिल का हाल बता देती है। प्रिया की बात सुनकर प्रिया की दोस्त उसकी सहायता करती है। जिस के बाद प्रिया के पिताजी का ऑपरेशन हो जाता है। इसके बाद वे धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगते हैं और प्रिया के पिताजी को अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है। फिर प्रिया और उसकी माँ उन्हें अस्पताल से घर ले आती है और उसके पिता जी ठीक हो जाते हैं। कुछ समय पश्चात प्रिया की दोस्त प्रिया से मिलने के लिए आती है। प्रिया और उसकी मम्मी वा पापा तहे-दिल से उसका धन्यवाद करते हैं।

कुछ दिन बीतने पर एक दिन फिर प्रिया की दोस्त प्रिया से मिलने आती है। वो प्रिया को निराश देख कर पूछती है कि तेरे चेहरे पर निराशा के बादल क्यूं छाए हुए हैं। इस पर प्रिया कहती है कि मैं अपनी पढ़ाई की लेकर और माँ-पिता जी को लेकर बहुत चिंतित हूँ।

उसकी दोस्त उसका हौसला बंधाते हुए कहती है कि तुम चिन्ता मत करो भगवान सब अच्छा करेंगे। मैं तुम्हारी सहायता करूँगी। मैं अपने दोस्त से बोलकर तुम्हें पार्टटाइम जॉब दिलवा दूंगी। जिससे तुम पढ़ाई भी कर पाओगी और अपने परिवार का निर्वाह भी अच्छी तरह से कर पाओगी।

इसके बाद प्रिया की टोस्त उसे पार्टटाइम जॉब दिलवा देती है। जिस से उनका गुजारा अच्छी तरह से चलने लगा। इसके बाद उसने अपनी दोस्त से जो उधार लिया था, वो कर्ज भी उसने चुका दिया। प्रिया ने अपनी माँ की नौकरी भी छुड़वा दी। इस तरह उनके घर से अंधकार दूर हो गया, और नई रोशनी हो गई

अंकिता