Sunday, July 26, 2026
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Kuno की व्यवस्थाओं पर सवाल, 23 चीतों-शावकों की मौत से घिरा चीता प्रोजेक्ट

Kuno : देश में सात दशक बाद चीतों की वापसी के लिए शुरू किया गया महत्वाकांक्षी चीता प्रोजेक्ट एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गया है। मध्यप्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में हाल ही में एक और चीते की मौत के बाद परियोजना की निगरानी, चिकित्सा व्यवस्था और वन्यजीव प्रबंधन को लेकर गंभीर चिंताएं उठने लगी हैं। पिछले साढ़े तीन वर्षों में कूनो में अब तक 23 चीते और शावकों की मौत हो चुकी है।
Kuno : इनमें कई मामलों में बीमारी, संक्रमण, डिहाइड्रेशन, दुर्घटना और आपसी संघर्ष को वजह बताया गया, जबकि कुछ घटनाओं में समय पर उपचार नहीं मिलने को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। हाल ही में मुरैना के पहाड़गढ़ क्षेत्र में घायल मिले चीता केजीपी-11 की इलाज के दौरान मौत ने एक बार फिर कूनो प्रबंधन की तैयारियों और दावों पर बहस तेज कर दी है।

चीतों के उपचार के लिए वन्यजीव अस्पताल स्थापित किया गया –

कूनो नेशनल पार्क में चीता प्रोजेक्ट के तहत अत्याधुनिक वन्यजीव अस्पताल स्थापित किया गया था. इस अस्पताल को विशेष रूप से चीतों के उपचार और आपातकालीन चिकित्सा सुविधा को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया था. यहां डिहाइड्रेशन, संक्रमण, चोट और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार के लिए आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं. अस्पताल में ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे, मोबाइल आईसीयू, ट्रेंक्यूलाइजेशन और अन्य उन्नत चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं. इसके अलावा नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के वन्यजीव विशेषज्ञों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से परामर्श लेने की व्यवस्था भी बनाई गई है. चीता कंजर्वेशन फंड तथा देहरादून स्थित वन्यजीव अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञ भी लगातार संपर्क में रहने का दावा किया जाता है.

इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि अस्पताल अब तक किसी गंभीर रूप से घायल या बीमार चीते को बचाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर पाया है. नवजात शावक ‘मुखी’ को बचाने के अलावा किसी भी गंभीर आपात स्थिति में अस्पताल चीतों की जान नहीं बचा सका. यही कारण है कि परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों और वन्यजीव प्रेमियों के बीच चिकित्सा तंत्र की प्रभावशीलता को लेकर चर्चा तेज हो गई है.

चीतों की निगरानी के लिए हाईटेक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है –

चीता प्रोजेक्ट के तहत चीतों की निगरानी के लिए हाईटेक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है. प्रत्येक चीते के गले में रेडियो कॉलर लगाया गया है, जिसकी मदद से उसकी लोकेशन और गतिविधियों पर नजर रखी जाती है. इसके अलावा ड्रोन कैमरे, सीसीटीवी निगरानी और वन अमले की लगातार गश्त की भी व्यवस्था है. हालांकि कई घटनाओं में यह सामने आया है कि घायल या मृत चीते की जानकारी प्रबंधन को समय पर नहीं मिल सकी. कई मामलों में किसी चीते के घायल होने का पता अगले दिन चला, जिससे समय रहते उपचार उपलब्ध नहीं कराया जा सका.

पिछले कुछ वर्षों में हुई मौतों की सूची भी चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है

मई 2023 में मादा चीता दक्षा की मेटिंग के दौरान हुए संघर्ष में घायल होने से मौत हो गई थी. इसके बाद जुलाई 2023 में नर चीता तेजस और सूरज की भी आपसी संघर्ष में घायल होने के बाद मौत हो गई. नवंबर 2024 में मादा चीता निर्वा के दो शावक जन्म के मात्र पांच दिन बाद मृत पाए गए. अगस्त 2025 में गामिनी के एक शावक की रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर होने के बाद मौत हो गई. मई 2026 में चीता केजीपी-12 के चार शावकों के शव क्षत-विक्षत अवस्था में मिले थे. वहीं हाल ही में घायल अवस्था में मिले केजीपी-11 ने भी उपचार के दौरान दम तोड़ दिया.

बीमारी और अन्य कारणों से हुई मौतों का आंकड़ा भी कम नहीं है. मार्च 2023 में मादा चीता साशा की किडनी संबंधी बीमारी से मौत हुई थी. मई 2023 में ज्वाला के तीन शावकों की अत्यधिक गर्मी और डिहाइड्रेशन के कारण जान चली गई. अप्रैल 2023 में नर चीता उदय की कार्डियक अरेस्ट से मौत हो गई थी. अगस्त 2023 में धात्री नामक चीता संक्रमण का शिकार हो गया, जबकि जनवरी 2024 में चीता शौर्य बीमारी और कमजोरी के कारण नहीं बच सका. अगस्त 2024 में नर चीता पवन की नाले में डूबने से मौत हो गई थी.

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के बीच यह चर्चा तेज

लगातार हो रही मौतों के कारण अब वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या कूनो का प्राकृतिक वातावरण, प्रबंधन प्रणाली और चिकित्सा व्यवस्था चीतों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए पर्याप्त है. विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आधुनिक तकनीक और अस्पताल बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय पर निगरानी, त्वरित उपचार और व्यवहारिक प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

हालांकि वन विभाग का कहना है कि चीता प्रोजेक्ट दुनिया की सबसे जटिल वन्यजीव पुनर्स्थापन परियोजनाओं में से एक है और शुरुआती वर्षों में चुनौतियां स्वाभाविक हैं. अधिकारियों का दावा है कि प्रत्येक घटना की वैज्ञानिक जांच कराई जाती है और उसके आधार पर व्यवस्थाओं में सुधार भी किया जा रहा है. बावजूद इसके, 23 चीतों और शावकों की मौत ने परियोजना की सफलता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

देश और दुनिया की नजरें कूनो नेशनल पार्क पर टिकी हुई हैं 

ऐसे में लगातार बढ़ रही मौतों ने न केवल वन विभाग बल्कि चीता प्रोजेक्ट की पूरी रणनीति को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है. अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में प्रबंधन इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और क्या कूनो वास्तव में चीतों के लिए सुरक्षित और स्थायी आवास साबित हो पाता है.

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