
स्वतंत्रत रचनाकार,
शिक्षिका सनराइज एकेडमी,
नई दिल्ली, भारत
पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण पक्ष के अमावस्या तक किया जाने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है श्राद्ध। सनातन धर्म में श्राद्ध का अर्थ होता है किसी भी कर्म को विधिवत श्रद्धापूर्वक करना। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। इसलिए श्रद्धा पूर्वक किए गए विधान को पितृ पक्ष या श्राद्ध कहते हैं। दूसरे शब्दों में एक पखवाड़े तक जब हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं, तब उनके प्रति श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहलाता है।
श्रद्धां दीयते, श्रद्धां क्रियते, श्रद्धां अनुदीयते
श्रद्धं आयेषु पितरं तृप्तः
“श्रद्धां दीयते” अर्थात श्रद्धा देना अथवा श्रद्धा अर्पित करना, जो हमारे विश्वास और आस्था का प्रतीक है।
“श्रद्धां क्रियते” का अर्थ है श्रद्धा करना या श्रद्धापूर्वक कोई कार्य करना, जो हमारे अंतस में उपजे विश्वास और आस्था को कार्य में बदलता है।
“श्रद्धां अनुदीयते” अर्थात श्रद्धा का अनुकरण करना उसकी प्रशंसा करते हुए उसे आगे बढ़ाना। यह वाक्यांश “श्राद्धं” शब्द के साथ उपयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है श्रद्धा या पूर्वजों के प्रति आदर व्यक्त करना।
इस प्रकार पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा उन्हें तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल (चावल) और तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।
तर्पण का अर्थ है तृप्त करने की क्रिया या जल का अर्पण करना। यह देव, ऋषि और पितरों को जल, दूध, तिल, जौ और अन्य पवित्र पदार्थों के साथ अर्पित करने का एक आत्मिक अनुष्ठान है, जिससे हमारी संकल्पनाओं के आधार पर उन्हें तृप्ति और शांति मिलती है और जीवित परिजनों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पिंडदान एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है “पिंड का दान करना”। इसमें चावल, जौ या अन्य अनाज के आटे से बनी गोल गेंदें (जिन्हें पिंड कहते हैं) को पितरों (दिवंगत पूर्वजों) की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए अर्पित की जाती हैं।
श्राद्ध सिर्फ एक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के प्रति हमारी कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक भी है। “श्रद्धया पितृन उद्धिश्य विधिना क्रियते यतकर्म तत श्राद्धम” अर्थात वह कर्म जो पितरों की मुक्ति के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक विधि-विधान से किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं। हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी होता है। ऐसी मान्यता है कि अगर किसी मृत व्यक्ति का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए, तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती है। इसलिए पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध करने की परंपरा है। पितरों के प्रति श्रद्धा ही सबसे बड़ा अर्पण है। यह अनुष्ठान पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, परलोक सिधार चुके आत्माओं को भौतिक संसार से मुक्ति दिलाने और उनकी आध्यात्मिक यात्रा में सहायता करने का एक तरीका है।
मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले अत्रि मुनि ने श्राद्ध का उपदेश दिया था। इसके बाद सबसे पहला श्राद्ध महर्षि निमि ने निकाला था। बाद में धीरे-धीरे कई अन्य महर्षि भी श्राद्ध कर्म करने लगे। महर्षि पराशर के अनुसार देश, काल और पात्र में हविषादी विधि द्वारा तिल, यव (जौ), और दर्भ (कुश, एक प्रकार के घास का तिनका) के साथ मंत्रो द्वारा किया गया श्राद्ध ही पितरों को मुक्ति दिलाता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार पितरों की तृप्ति के उद्देश्य से उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किये जाये उन्हें श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं।
श्राद्ध का यह पखवाड़ा हमें उन सभी का स्मरण कराता है जिन्होंने हमारे जीवन की नींव रखी। श्राद्ध में ब्राह्मणों के माध्यम से पितरों की तृप्ति के लिए भोजन कराया जाता है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन भी श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है। अपने मृत पितृगण के लिए श्रद्धा भाव से किये श्राद्ध को पितृ यज्ञ भी कहते है, जिसका वर्णन हमारे शास्त्रों में मिलता है। श्राद्ध पक्ष अपने पूर्वजों को नमन करने और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को धन्य बनाने का समय होता है।
इस पखवाड़े में हम तर्पण, पिंडदान और पूजा के माध्यम से उनकी आत्मा की शांति की कामना करते हैं। श्राद्ध के अनुष्ठान में तर्पण, पिंडदान, पूजा, ब्राह्मण भोजन और दान जैसी प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। तर्पण, पिंडदान और दान के माध्यम से हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं और अपने संस्कारों और परंपराओं को जीवित रखते हैं। मृत्यु के बाद जो लोग देव योनि या पितृ योनि में जाते है उनको मंत्रो द्वारा बुलाये जाने पर वह निमंत्रित ब्राह्मण के माध्यम से भोज कर लेते हैं। पितृ पक्ष में दान का भी बहुत महत्व है। मान्यता है कि दान से पितरों की आत्मा को संतुष्टि मिलती है और पितृ दोष भी खत्म होता है। हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि भी आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं, ऐसा शास्त्रोक्त है। इस प्रकार सबसे पहले महर्षि निमि ने श्राद्ध का आरम्भ किया। उसके बाद सभी महर्षि उनका अनुसरण करते हुए शास्त्र विधि के अनुसार पितृयज्ञ (श्राद्ध) करने लगे । ऋषि पिण्डदान करने के बाद तीर्थ के जल से पितरों का तर्पण भी करते थे। धीरे-धीरे चारों वर्णों के लोग श्राद्ध में देवताओं और पितरों को अन्न देने लगे। पितृपक्ष, चतुर्मास की अवधि का आखिरी पड़ाव होता है। इसके बाद शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है।










