जबलपुर। भारतीय रेलवे अब अपने सिस्टम से भ्रष्टाचार की धूल झाडऩे के लिए पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। पारदर्शिता की इस नई कवायद में रेलवे बोर्ड ने एक बड़ा फैसला लेते हुए उन कर्मचारियों पर नकेल कसी है, जो सीधे जनता के संपर्क में रहते हैं। बोर्ड का आदेश पश्चिम मध्य रेलवे मुख्यालय जबलपुर सहित देश के सभी रेल जोनों को भेजा जा चुका है.
अब टीटीई, बुकिंग क्लर्क और सुपरवाइजर जैसे नॉन-गजटेड कर्मचारियों के लिए अपनी संपत्ति का पूरा ब्योरा देना अनिवार्य कर दिया गया है। रेलवे बोर्ड के इस पत्र ने महकमे में हलचल मचा दी है।
इस नए नियम के तहत अब केवल बड़े अधिकारी ही नहीं, बल्कि 4600 रुपये ग्रेड-पे या उससे अधिक वेतन पाने वाले ग्रुप-सी कर्मचारियों को भी अपनी अचल संपत्ति का सालाना रिटर्न (आईपीआर) भरना होगा।
पहले सिर्फ बड़े अधिकारियों को ही आईपीआर भरना होता था। खास बात यह है कि इस दायरे में उन पदों को प्राथमिकता दी गई है जहां रुपयों का सीधा लेन-देन होता है, जैसे- कमर्शियल स्टाफ, रिजर्वेशन और बुकिंग क्लर्क, ऑन-बोर्ड स्टाफ में टीटीई और टिकट चेकर, मैनेजमेंट में विभिन्न विभागों के सुपरवाइजर और पार्सल क्लर्क आदि।
रेलवे बोर्ड की निदेशक(स्थापना) प्रिया गोपाल कृष्णन द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि कर्मचारियों को सिर्फ अपनी ही नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर खरीदी गई जमीन, मकान या फ्लैट की जानकारी भी देनी होगी।
इसमें विरासत में मिली संपत्ति से लेकर लीज या मार्टगेज पर ली गई प्रॉपर्टी तक का पूरा विवरण शामिल करना होगा।
क्यों पड़ी इस सख्त कदम की जरूरत?
अक्सर यह शिकायतें आती थीं कि रेलवे के फ्रंट-लाइन स्टाफ की संपत्ति उनकी आय के ज्ञात स्रोतों से कहीं अधिक बढ़ रही है। पूर्व में कई कर्मचारी खुद को इस नियम के दायरे से बाहर मानकर संपत्ति का खुलासा नहीं करते थे।
इस नई व्यवस्था से न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, बल्कि रेलवे की छवि भी आम जनता के बीच और अधिक विश्वसनीय बनेगी।











