बुद्ध बनाम स्त्री: स्नेहा किरण

स्नेहा किरण

आत्मकथ्य- आध्यात्मिक जागरण जो की इस मृत्युलोक में किसी भी व्यक्ति की अंतिम सबसे बड़ी सफलता है, इस पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में इसे भी प्राप्त करना पुरुषों के लिए सहज और स्त्री के लिए कठिन ही है। इसलिए जब भी कोई स्त्री अपने जीवन के कई संघर्षमय चरणों से गुजर कर आध्यात्मिक दुनिया में जाने के लिए अपने कदम बढ़ाए तो हम सबको बिना कोई बवाल खड़ा किए, उसके इस निर्णय का सम्मान, समर्थन औऱ हौसलाअफ़जाई करना ही चाहिए। यही तर्कसंगत भी होगा और यह व्यापक तौर पर समाज के हित में होगा।

मैं सोच रही थी की
बुद्ध होना भी
वाकई कितना आसान होता है
है ना?
की एक रात चुपके से
घर-द्वार, स्त्री-बच्चे सभी को
छोड़ कर
सत्य की खोज में
यूं ही निकल जाना
कितना आसान है
है ना?

क्योंकि,
कोई उंगली
उठती नहीं आप पर
न ही ज्यादा सवाल
पूछे जाते हैं?
कोई लांछन भी तो नहीं लगाता
और तो और
शब्दों के बाणों से
तन-मन छलनी नहीं किया जाता
है ना?

लेकिन,
क्या कभी किसी ने सोचा है?
बुद्ध की जगह
अगर कोई स्त्री होती तो?
तो?
और अगर
वो चुपके से निकल जाती
एक रात
घर-द्वार, पति, नवजात शिशु को छोड़कर
सत्य की खोज में
तो?

क्या कोई विश्वास करता
उसकी इस बात पर

हजारों यातनाएँ, तोहमतें लगायी जातीं

उसके स्त्रीत्व को पग-पग पर
लाँछित किया जाता

पूरे का पूरा यह बेहया समाज
खड़ा हो जाता
उसके विरुद्ध,
और
ये होती उसकी सत्य की अंतिम खोज
वाह
सच
बुद्ध होना भी कितना आसान है
और स्त्री होना कितना कठिन