मैं तुम्हारी कौन हूं: रूची शाही

रूची शाही

देर तक पुकारा था तुम्हें,
आवाज दफ्न होने तक
सुन के भी अनसुना किए तुम
शब्द-शब्द मेरे खोने तक
हो गई है खामोश अब,
सिसकियां भी मेरी चीखकर
आँखों ने की थी प्रार्थना
अंतिम आंसू रोने तक

मैं नहीं पूछूंगी तुमसे
कि था मेरा अपराध क्या
प्रेम के बदले प्रेम मांगा
और इसके बाद क्या
कह दो कि कुछ और चाहा
तो मैं आँखें मूंद लूं
कहां रह गई थी कमी,
है तुम्हें कुछ याद क्या

लिख-लिख के भी दर्द मैं
रूह-रूह तक बेचैन हूं
चीखती थी आहें कभी पर
अब अक्षर-अक्षर मौन हूं
फिर भी है एक सवाल बाकी
मन की देहरी पर खड़ा
दे दो उत्तर मुझे कि
मैं तुम्हारी कौन हूं..?