
मैं एक अंग्रेज़ी विषय का शिक्षक हूँ। वर्षों से विद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाते-पढ़ाते मैंने इस भाषा की गहराइयों को समझने और दूसरों तक पहुँचाने का प्रयास किया है। विद्यार्थियों को शब्दों की व्युत्पत्ति समझाना, व्याकरण की बारीकियों से परिचित कराना और लेखन-कला का अभ्यास कराना मेरे दैनिक कार्य का हिस्सा रहा है। समय के साथ यह केवल पेशा नहीं रहा, बल्कि मेरी पहचान का एक अहम हिस्सा बन गया।
अंग्रेज़ी भाषा ने मुझे आत्मविश्वास और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया। देश-विदेश के मित्रों से संवाद करते हुए, विचार-विनिमय करते हुए, मैंने महसूस किया कि भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं है, बल्कि यह संस्कृतियों को जोड़ने का पुल भी है। विद्यालय जीवन से प्रारंभ हुआ यह सफर आज तक निरंतर जारी है। अंग्रेज़ी ने मेरे ज्ञान की सीमा को विस्तृत किया, अवसरों के द्वार खोले और वैश्विक दृष्टि प्रदान की।
परंतु इस पूरी यात्रा में एक बात स्पष्ट रही- अंग्रेज़ी सीखने के बावजूद मैंने अपनी ‘अंग्रेज़ियत’ नहीं अपनाई। मेरे जीवन का आधार और मूल तत्व हमेशा हिंदी ही रही। मेरी जड़ों से, मेरी मिट्टी से, मेरी संस्कृति से मेरा जुड़ाव हमेशा हिंदी भाषा ने ही बनाए रखा।
जब मैं विद्यार्थियों को अंग्रेज़ी सिखाता हूँ, तब भी अपने दैनिक जीवन में हिंदी का प्रयोग मुझे आत्मीयता और गर्व से भर देता है। यह मातृभाषा मेरे लिए केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि मेरी पहचान, मेरा गौरव और मेरी संस्कृति की धरोहर है। हिंदी बोलते हुए मैं अपने देश की धरती और परंपराओं से गहरा जुड़ाव अनुभव करता हूँ।
आज के समय में जहाँ बहुत से लोग अंग्रेज़ी को आधुनिकता का प्रतीक मानते हैं, वहीं मुझे लगता है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूलना नहीं है। अंग्रेज़ी हमें अवसर देती है, पर हिंदी हमें आत्मा और संस्कार प्रदान करती है। अंग्रेज़ी से मैंने सीखा कि विश्व को कैसे समझा जाए, पर हिंदी ने सिखाया कि स्वयं को कैसे पहचाना जाए।
हिंदी के माध्यम से ही मैंने मातृभूमि के प्रति प्रेम, अपनी संस्कृति के प्रति लगाव और अपने लोगों के प्रति आत्मीयता का अनुभव किया है। हिंदी मेरे लिए केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण है।
इसलिए मैं मानता हूँ कि अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों का संतुलित प्रयोग ही हमें आगे बढ़ा सकता है। अंग्रेज़ी हमें वैश्विक नागरिक बनाती है, जबकि हिंदी हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है। हिंदी से ही हम हिंदू कहलाने का गौरव अनुभव करते हैं और इसी से हमारी पहचान कायम रहती है।











