
ज्योतिष केसरी
रक्षाबंधन हमारे प्रमुख हिन्दू त्यौहारों में से एक है, जो प्रतिवर्ष श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रक्षाबंधन में रक्षासूत्र, जिसे राखी कहते हैं, का बहुत महत्व है। राखी कच्चे सूत के धागों से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे तथा सोने या चांदी जैसी महंगी वस्तुओं तक की हो सकती हैं। राखी सामान्यतः बहनें अपने भाईयों को बांधती हैं। लेकिन ब्राह्मणों, गुरुओं, और परिवार की छोटी बच्चियों द्वारा बड़े सम्बन्धियों को भी बांधी जाती है।
आजकल सार्वजनिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्तियो को भी राखी बांधने का रिवाज चल पड़ा है। साथ ही प्रकृति के संरक्षण हेतु वृक्षों को भी राखी बांधी जाने लगी है।
हिन्दू धर्म के सभी अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बांधते समय ब्राह्मण या आचार्य निम्न श्लोक बोलते हैं-
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे, मा चल मा चल।।
अर्थात- जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र बलि राजा को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बांधता हूँ। हे रक्षे! तुम अडिग रहना। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबंधन के प्रसंग में उपरोक्त श्लोक मिलता है।
कथा कुछ इस प्रकार है-
जब दानवेन्द्र राजा बलि ने सौ यज्ञ पूरे कर तीनो लोकों में विजय प्राप्त कर लिया और इंद्र से स्वर्ग छीनने का प्रयत्न किया तो सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने वामनावतार लेकर राजा बलि का अहंकार चूर किया और तीन पगो में ही तीनो लोको को दान में ग्रहण कर लिया। इस प्रकार राजा बलि के अहंकार को चूर करने के कारण इस त्योहार को बलेव भी कहते हैं। उस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर उसे पाताल लोक का अधिपति बना दिया। तब राजा बलि ने भक्ति बल से भगवान विष्णु से रात दिन अपने सामने रहने का वर मांग लिया। कई वर्षों तक विष्णु जी के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जा कर उन्हें रक्षा सूत्र बांध कर अपना भाई बना लिया और भगवान विष्णु को अपने साथ अपने घर ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी।
विष्णु पुराण के एक अन्य प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण मास की पूर्णिमा को ही भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को असुरों के चंगुल से मुक्त कराया था और उन्हें वापस ब्रह्मा जी को सौंप दिया था। इसलिए इसे वेदों की रक्षा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
महाभारत में भी वर्णन आता है कि इस दिन द्रौपदी ने भगवान कृष्ण के हाँथ पर चोट लगने के बाद अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर चोट पर बांधा था, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें वचन दिया था कि वे सदैव उनकी रक्षा करेंगे।
एक अन्य ऐतिहासिक जनश्रुति के अनुसार चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी बांध कर चित्तौड़ का गुजरात के सम्राट से रक्षा का वचन लिया था।
कुछ लोग इस पर्व से पहले उपवास रखते हैं, फिर रक्षाबंधन वाले दिन शास्त्रीय विधि-विधान से राखी बांधते हैं। साथ ही वे ऋषि और पितृ तर्पण भी करते हैं।
कुछ क्षेत्रों में इस दिन लोग श्रवण पूजन भी करते है। वहाँ ये त्योहार माता-पिता भक्त श्रवण कुमार की याद में मनाया जाता है, जो भूलवश राजा दशरथ के हांथो मारे गए थे।
इस दिन सभी बहनें व्रत रखकर अपने भाई को राखी बांधती हैं , उनका मुंह मीठा कराती हैं और उनसे अपनी रक्षा का वचन लेती हैं। बदले में भाई उन्हें कुछ उपहार देते हैं।
इस वर्ष 2025 में कब है रक्षाबंधन
इस वर्ष श्रावणी पूर्णिमा दिनांक 8 अगस्त को शुरू होगी। किंतु इस दिन पूर्णिमा शुरू होने के साथ भद्रा भी शुरू हो रही। जो देर रात लगभग 2 बजे खत्म होगी। अतः 8 अगस्त को रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया जायेगा, 9 अगस्त को भद्रा समाप्त हो चुकी होगी। अतः रक्षाबंधन 9 अगस्त 2025 को ही मनाया जायेगा। इस दिन प्रातः 6 बजे से दोपहर 1:20 बजे तक राखी बांधने का श्रेष्ठ मुहूर्त है। उसके बाद सावन माह का कृष्णपक्ष प्रारम्भ हो जाएगा।
राखी बांधने में रखें सावधानी
भाई की लंबी आयु और स्वास्थ्य स्मृद्धि के लिए बहनों को राखी बांधने में कुछ सावधानी बरतनी चाहिए।
- राखी बांधते समय काले और नीले वस्त्र न धारण करें।
- राखी कटी फटी या पुरानी नहीं होनी चाहिए।
- भाई का मुंह पश्चिम और बहन का मुंह पूर्व दिशा की तरफ होना चाहिए।
- राखी बांधते समय भाई के हाथ में नारियल या फूल और चावल होना चाहिए। खाली हाथ राखी ना बांधे। राखी बांधकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ध्यान करके 3 गांठें मारनी चाहिए।
- बहनें यदि व्रत रखें तो अति उत्तम होगा।











