उषा किरण
एक रीतेपन का अहसास
मेरे मन में एक अजाने दर्द की सृष्टि करता है
और मैं जान भी नहीं पाती कि
ऐसा क्यों होता है, क्या होता है
मन बार- बार छटपटाता है
जैसे मन के अंदर कोई
कोई परकटा पंछी
अपनी बैंजनी उड़ाने भरने को आकुल हों
तभी नियति के सुदूर कोने से
एक बबंडर – सा उठता है और
एक अजीब- सी पीड़ा
मेरे मन में समा जाती है
परंतु मन के इस अंधड़ में
कहीं कोई आलोक का कतरा
रह जाता है, जो हमेशा
मुझे दीप – स्तंभ की तरह
फिर आगे बढ़ा देता है—-
आलोक प्रेम का— याद का।















