राजस्थान- शौर्य, संस्कृति और स्वाभिमान की धरती: डॉ. निशा अग्रवाल

डॉ. निशा अग्रवाल
शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका
जयपुर, राजस्थान

रेगिस्तान की रेत सुनाती, शौर्य भरी कहानी है,
सूरज सा तेज लिए खड़ा, यह माटी का मर्दानी है।
अरावली के शिखरों से, जलधाराएँ फूटती,
साँस्कृतिक वैभव में इसकी, धरा स्वयं है झूमती।

रेत कणों में बसी कहानी, शौर्य, तपोबल, बलिदान,
स्वाभिमान की माटी गाती, जय जय राजस्थान!
अरावली के शिखरों से, थार की विस्तृत छाँव,
प्राकृतिक अनुपम सौंदर्य का, देखो अद्भुत ठाँव।

थार मरुस्थल की लहरों में, सोने सा यह रेगिस्तान,
लूणी, चंबल, बनास की धारा, सिंचित करती यह स्थान।
तपती धूप, ठंडी छाया, बदले मौसम के अंदाज,
धरती पर जैसे सजता हो, चित्रित स्वर्णिम साज।

मरुभूमि की धधकती लपटें, फिर भी जीवन महक रहा,
चंबल, बनास, लूणी जैसी, नदियों का जल बहक रहा।
थार की रेतीली छांव में, खिलती केसरिया धूप,
ऊँटों की पदचापों संग, गूँज रही प्रेम की स्वर-रूप।

घूमर, कालबेलिया नृत्य, जब पाँवों में रुनझुन बजे,
मांड-राग की सुरलहरियाँ, हृदयों में संजीवनी सजे।
अंबर से नीला जयपुर, जैसलमेर का स्वर्णिम रंग,
हर गली-चौबारे में, रचा-बसा है प्रेम अनंग।

चित्तौड़गढ़, जैसलमेर, आमेर के भव्य ये दुर्ग,
कला-सौंदर्य, स्थापत्य में, अनगिनत छिपे सुरग।
घूमर, कालबेलिया, के लोक नृत्य निराले,
पधारो म्हारे देस, यहाँ हैं रंग अनेक प्याले।

हाड़ी रानी हंसते-हंसते, शीश काट बलिदान दिया,
स्वाभिमान की रक्षा को, प्रेम-प्रीति सब त्याग दिया।
वीर दुर्गादास के साहस से, कांप उठा था बादशाह,
मरुभूमि की संतानों ने, लिखा शौर्य का इतिहास।

हल्दीघाटी रणभूमि में, राणा ने तलवार चलाई,
शत्रु हिले, चेतक चला, जय मेवाड़ की ध्वजा लहराई।
पन्नाधाय का त्याग महान, पुत्र नहीं, बलिदान दिया,
भामाशाह ने कर्ण समान, स्वर्ण समर्पण दान किया।

केर-सांगरी, दाल-बाटी की, खुशबू रचे पकवान,
अतिथि देवो भव: की मूरत, यहाँ बसे इंसान।
वीर भूपों की गाथा इसमें, हर पग में अंकित है,
गर्व से हम सब कहते हैं, “राजस्थान अद्वितीय है!”

केर-सांगरी की थाली जिसमें, दाल-बाटी का स्वाद,
मेहमानों का मान जहाँ हो, समता का संवाद।
वीर भूपों की गौरव गाथा, हर पग में अंकित है,
गर्वित से हम सब कहते, “राजस्थान अद्वितीय है!”