नाउम्मीद सा होता कल
नहीं सीख पर कोई अमल
सृष्टि प्यासी रह जाएगी
धरती रह जाएगी सजल
सब कुछ सूना है बिन जल
खेतों में फसलें सूख गयी
नीर सतत होता गंदल
महामारी के सबब बन गयी
निकलें नैन अश्रु अविरल
सब कुछ सुना है बिन जल
पृथ्वी का दोहन हो रहा
रिक्त हो गया है कलल
नहीं दिखती अब हरियाली
नहीं चहकते पंछी चंचल
सब कुछ सूना है बिन जल
मानव स्वार्थी हो गया है
बनाता नित कारखाने-कल
प्रकृति मज़बूर हो गयी है
कैसे मिले उसको संबल
सब कुछ सूना है बिन जल
बातें कितनी बनायीं हमने
लेकिन मुद्दा वही रहा असल
जीवन का सुकून छिन गया
‘उड़ता’ ये कैसा है दलदल
सब कुछ सूना है बिन जल
-सुरेंद्र सैनी बवानीवाल ‘उड़ता’
713/16, झज्जर, हरियाणा
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